कल काफ़ी दीनो के बाद
एक भूरा-सा, चंचल
बादल पिघल रहा था…
अपनी मस्ती मे ज़ुमक़र
आने जाने वाले हर शख्श,
हर रास्ते, हर राह,
हर मकान, हर पत्ते
को भिगो रहा था…
मस्ती चढ़ि थी
उसे, बुन्दो की, बौछारो की,
जाने क्या पिलाया था
धूपने उसे….अपनी
सत-रंगी हंसी बिखेर रहा था..
आसमान भी उसको
अपनी पनाहो मे पाकर
कुछ गिला-सा हो रहा था…
अचानक थम गया बादल..
कोई बेचारा – सा
बादल से जाने रूठा - सा
बारिश से छूट रहा था
बादल आया था
मदमस्त होली खेलने
और, वो छुप रहा था …
बादल सा भूरा
उस, बेशरम ने, एक
छाता खोल दिया था
और
बादल को STATUE उसने
जैसे बोल दिया था !!!
Sunday, September 16, 2007
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