सरहद के उस पार से
आती है सौंधी सी हवाए
शायद वहा पानी बरसा होगा
वहा भी कोई मुज-सा तरसा होगा.
लहेरो ने कांधा दिया होगा
और कुछ फूलोने खुस्बू,
चिड़ियोने दी होगी अपनी आवाज़
और किरनो ने अपनी चलने की धार..
हवाए…
पास आके थम सी गई है
सामने खड़ी है, पुराने
किसी दोस्त की याद लेकर
वही ले आई है साथ मे,
सदके मे भेजी है कुछ बाते भी
शायद….
ज़मीन पर कोई रेखा तो खिंची नही
कही कोई दीवार उसे दिखी नही
मैं देख सकती हू उसे
मेहसूस कर सकती हू उसे
बस छुने भर की देरी है…
पल भर की बात है
फिर वो सन्देसे, वो बाते
मेरे दोस्त की, सिर्फ़ मेरी होगी
वो हवाए मेरी सहेली होगी…
पर आज के अख़बार मे एक ख़बर आई है
आज से उस ओर की हर हवा पर भी टॅक्स लगेगा…
Sunday, September 16, 2007
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