एक ज़माना
था
किनारे भी समुंदर के साथ साथ
चला करते थे
क़दम से क़दम मिला कर
कुछ भी हो जाए
वो टूटते नही थे
चाहे समुंदर कितना
गुरराए, कभी खुदसे छूटते नही थे
फिर एक दिन जाने क्या
ऐसी वैसी ही कोई
बात थी शायद
उबल पड़ा समुंदर किनारो पर
ऐसा वैसा कुछ बोल दिया
बेचारे! किनारे
सहम के रहे गये
कुछ ना बोले, कुछ ना बोल पाए
फिर वापस आया समुंदर
जाने कितनी मन्न्ते की
दिल टूटा था किनारे का
छूट गये थे बस उनके निशा
अब रोज़ बुलाता रहता है समुंदर
दूर जाता है पास आता है समुंदर
जाने कितनी बाते करता है समुंदर
कितने आसू रोता है समुंदर
पर किनारे बस-
चुपचाप है सहमे हुए
चलते नही है साथ
थम गये है सदा के लिए.
Sunday, September 16, 2007
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