Sunday, September 16, 2007

~~~ कुछ त्रिवेणी ~~~

शर्मसे फिर लाल लाल हो गई आशिक़ि उसकी
पन्नोसे गिरा जब सुर्ख़ लाल गुलाब का पत्ता

कितने मौसम छिपा के रखे है आज भी उसने!
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मौसम-ए-उम्र भी ढल जाएँगे एक दिन
रहेने ही दिजे रवायते ख़ुदको हसी रखने की

अक्सर आईने अपनी सूरते बदल ही लेते है
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इतनी रोशनी फिर ये अंधेरा कैसा है?
ज़ार ज़ार हो जौ मैं ऐसे वो खटकता है

सूरज दीवार पर टॅंगी तस्वीर मे चमक रहा था
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लिपट जाती है तेरी याद हवाओके साथ
फ़िरसे आहेसास दिलाते मेरे ज़िंदा होनेका

एक कमरे मे बंद करके रख आउ हवाओ को
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सोचा था अगली बारिश पर तुम्हारे साथ भिगेंगे
काग़ज़ की नाव मे बैठकर कुछ दूर तक जाएँगे

लिखा था जिसमे वो काग़ज़ ही तुम्हे कभी दे नही पाया मैं
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बेवजह उड़ते रहते है परदे मेरी खिड़की पर
हवा आया जाया करती है, ज़ान्क्ति है कभी कभी

बचपन मे हम भी तो यू ही मिला करते थे अक्सर
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पूरे कमरे मे एक ही चाँद था
मैने आँखो मे समाकर बंद कर लिया

अब चमकता है मेरे कपोल पर चाँद बन कर
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बहोत बारिश हुई थी पिछले साल
इतना गिला हुआ सूरज की सर्दी हो गई

दर के मारे सूरज ने रेनकोट पहन लिया अब की बार
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सियाही के भी रंग बदल जाते है
साल अक्सर पन्नो को फाड़कर निकल आते है

कुछ पन्नो को लॅमिनेट करवाना चाहता हू
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सुबह सवेरे बाग़ीचे मे कुछ बादल खेलने निकले
माली आया और तेज़ धूप मे सारे छुप गये

जाने बारिश कौन से बादल के साथ छुपी होगी?
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आईना दिखता है मुजे मुज से बेहतर
तेरी आँखो मे कुछ और नज़र आता हू मैं

कुछ और ग़लतफ़हेमी तेरे पास आकर पता हू मैं
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तारे चल पड़े है आज काज़लसी रात मे
बादलोने कुछ जश्न मनाया लगता है

मिला नही पर मुजको इन्विटेशन तो भेजा होगा
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गले के नीचे निवाला उतरता नही
शायद नामक कम था!

शायद भूख कम थी
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बेताल्लुक सी ही कुछ बातें होंगी
वस्ल-ए-यार पे और क्या सूरत होगी

कभी शर्मसे लाल लाल, कभी हयासे पानी पानी!
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रातभर ज़मीन पर बूँदे गिरती रही
फूलोने समेट लिया, धरती मे समा गई

ओस बनकर टपका था खुदा की आँखो से पानी
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कुछ बादल लड़ पड़े आपसमे
हर गये वो फूट फूट कर रोए

बारिशके पानी मे भी ख़ाराश थी आज
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कुछ सालो से गली के नुक्कड़ पर बैठता है वो
जाने कितने लोगो के सपनो के महल बुनता है वो

आज भी उस ज्योतिश का पता पुरानी खोली नो. 840 ही है!!

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