जब भी आती है धूप मेरे आँगन मैं
तेरी याद साथ ले आती है
पश्चिमसे आनेवाली वो हवा भी
हर बार वो खिड़की खोल जाती है..
अबकी बार जो
बरसात बरसेगी; उसमे पानी नम होगा
और
हिमालय पर भी इस बार
कुछ ज़्यादा ही बर्फ़ की चादर छाएगी
फूल भी कुछ ज़्यादा ही महेकेंगे अब के बरस
और
आसमान मे कुछ और गहेरी रंगोली रचाएगी.
क्या हुआ जो वक़्त
पत्थर बनके किस्मत पर लगा हो
क्या हुआ जो माँगा
वो कुछ इस तरहसे मिला हो
की
मंदिर मैं जाकर फिर
कुछ माँगने की ज़रूरत ही ना रहे
अपने लिए माँगकर देखा था
सालो-भर
एक बार तेरे लिए माँगा-
और दुआ कबुल हो गई-
मेरे हिस्से - बस
हरसू बिखरी
तेरी याद ही रह गई -
Sunday, September 16, 2007
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