मुंडेर पर आकर धूप
बैठती है, सुनती है
सूरज की सारी बाते
सूरज की दोस्त हों
जैसे, आ जाती है
धूप…।रोज़……सूरज के साथ साथ
छिप जाती है
घने पेडो के पत्तो के भीतर
तालाब के ठहरे पानी पर
चिलमीलाती है धूप…
छोड़कर जाना चाहो तो
छांव के सर चढ़ जाती है
सूरज की उम्र से बढ़कर
तो उम्र नही होगी उसकी
रोज़ ही आती है……।
रुठ जाती है जब
सूरज से मिलने कभी
बादल आ जाते है
छुप जाती है
नज़र नही आती पर
मेहएसूस कराती है…मैं धुप
फिर ख़ुद ही मान जाती है
कभी बादल के बरसने पर
तोहफ़े मे मिली पानी की
बूँदसे ख़ुश होकर
खिलखिलाती है
इंद्रधनुषी हंसी देते हुए…धूप।
Sunday, September 16, 2007
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