देखने के लिए एक सपना ढूँढ रही हू
जीने के लिए तेरा बहाना ढूँढ रही हू
जो साथ मेरे हर कोई गा सके
एक ऐसा तराना ढूँढ रही हू
कल पत्तो ने हसके बात कही थी ज़िंदगी की
आज वो पत्ते नही रहे
ज़िंदगी रुकी नही, ज़िंदगी थमी भी नही
अब नये पत्तो का फ़साना ढूँढ रही हू
जो बनकर बिगड़ जाता है
जो पास आकर बिछड़ जाता है
वो अपना नही होता, वो पराया भी नही होता
वो मेरे साथ मेरा था वो ज़माना ढूँढ रही हू
कुछ वादे किए थे बिन कहे
कुछ कसमे ली थी बिन सुने
जो कहा नही होता, वो सुना नही जाता
जागती आँखो से अब ना जाने क्या सपना ढूँढ रही हू
Sunday, September 16, 2007
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