पता नही क्यू, हर रोज़
सूरज
क्या ढूँढने निकलता है
धरती के इस छोर से
उस और तक
ना जाने क्या ढूंढता है
रोज़ रोज़ आता है
रोज़ चला जाता है
ना थकता है
ना रुकता है
ना रोता है ना सोता है
ना याद, ना फ़रियाद करता है
बस आता है और
चला जाता है
जैसे किसीको
वचन दिया हो
इस जगह, इस वक़्त
तुम्हे हर वक़्त मिलूंगा..
ओर बस आता है
धूप बाँटता है
चला जाता है
कल आने दो सूरज को
कल तो पूछ ही लूंगी
कौन है जिसकी
राहों मैं वो
इतनी पलके बीछाता है
इतने साल हो गये फिरभी
कभी टूटा नही
ऐसा दिया वचन की
फिर कभी सूरज
रूठा नही
इतनी चाहत किससे है
इतनी चाहत कैसे है
जब भी आता है
ज़िंदगी बनाता है
ओर चला जाता है
जाने क्यू सूरज
ऐसे वादा निभाता है!
Thursday, August 23, 2007
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