Thursday, August 23, 2007

~~~ तेरा नाम ~~~

ओस पे लिख के तेरा नाम
बिखेर देती हू; फिर
ढूँढती रहती हू मैं उसे
समुंदर की गहराई मे.
कभी वो मिल जाता है
बादल के बरसते पानी मे.
कभी बहे निकलता है
मेरे शब्दो की ज़ुबानी मे.
मैं गुनगुना लेती हू उसे
जिसे मैं ही सुन सकती हू.
फिर भी गुनाह-सा लगता है
तेरा नाम कभी-कभी
मुजे मेरा नाम-सा लगता है
ओर कभी ये भी लगता है
की तुम्हारे नाम सा हसीं-
कोई और नाम ही नही
मेरे नाम को उससे जोड़ती रहती हू ऐसे,
जैसे मुझे और कोई काम ही नही.
बस...ओस पे लिखती रहती हू तेरा नाम.

No comments: