ख़ामोश रहता है चाँद
तारो भरी रात मे भी
आता है कुछ कहेने
पर यू ही चला
जाता है, बिना कुछ
लिखे, बिना कुछ कहे.
लगता है कहेने के
लिए, कोई लब्ज़ ही
नही उसके पास, पर
बाते तो हज़ार होगी!
रोज़ आता है, बस
एक दिन जाने कहा
चला जाता है, इतने
सारे तारो को छोड़कर
बिना कुछ कहे…
जाकता है कभी
अभ्र मे बिखरे कुछ
बादलोके पीछे से
कभी कोई सितारे
के आगे चुपचाप
खड़ा हो जाता है
बिना कुछ कहे…
जाने क्या कहेना
है उसे, कह ही नही पता
चाँद है फिर भी,
चुपचाप सा रहता है
कल मिल गया
मुजे सुबह सवेरे
हल्का सा धुला हुआ
ओस मे भीगके
कुछ नीला हुआ
सूरज की रोशनी मे
कुछ शरमाया हुआ
पूछ लिया मैने
उसके जाने से पहेले, जल्द ही
क्या बात है जो
बता नही पाता वो,
मुजे ही कहे दे, शायद,
कुछ नही कहा, बस मुस्कुराया
अपनी चाँदनी बिखेर दी मुज पर
और बिखेरते हुए – बस – चला गया……..
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