सूरज को मन किया
मिलने से चाँद को
ओर बस
वो निकल पड़ा
चलता रहा
बस चलता रहा।
एक पल भी नही रहा खड़ा.
चाँद तो बस
बेख़बर-सा
सूरज से और
खुदसे
रात के आगोशमे
तारो के साथ
बतियाने मे लगा था.
उसे क्या पता
सूरज उसके पास
आकर मिलना चाहता है उसे
-पल भर.
चाँद से मिलने की
ख़्वाहिश मे
कभी पास
कभी दूर
होता चला
चाँद को रोशन
करता चला
सूरज
चाँद की और बढ़ता चला.
आज
लगता है
चाँद पूरा है
शायद
सूरज ने आज
चाँद को
पा ही लिया
है
ओर फिर भी
चाँद तो बेख़बर
थोड़े तारोके साथ,
सूरज से
रोशन-रोशन.
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