धूप से हलके, हवा से पतले
पानी से उजले, कुछ ख्वाब तेरे
आते है, चले जाते है
रोशनी सी छा जाती है
पल भर के लिए…
मुस्कान जगा जाती है
पल भर के लिए…
पल भर के लिए
भूल जाते है सारे शिकवे
सारे गिले धूल जाते है
खो जाता है मन मेरा
मेरा कहा अब वो…
जैसे अब कहेती हू तुम्हारे लिए
मेरा कहा अब वो…
मेरा कहा अब वो
वो रात का आँचल, वो आँख का बादल
वो लब तेरे चंचल, वो सांसो की हलचल
सब जो मेरा था, अब वो तेरा है
तू भी तो अब … तेरा हुआ..
क्या था जो दे सकु, तुम्ही को दे दिया तुम्हे
तू भी तो अब …तेरा हुआ…
तू भी तो अब…तेरा हुआ
मेरा पास रहा क्या बाक़ी
कुछ ख्वाब तेरे, कुछ यादो की ज़ांकी
आँचल मे छोड़ गया अपने लब्ज़ो को
धूप से हल्के, हवा से पत्ले
कुछ ख्वाब तेरे, आते है, चले जाते है
धूप से हल्के, हवा से पत्ले..
Sunday, September 16, 2007
~~~ कमरा ~~~
मैने अपने कमरे का
दरवाज़ा बँध कर दिया
वो कमरा … जिसकी चार दीवारे थी
हर दीवार तुमको प्यारी थी
कमरे मे सामने की दीवार पर
बहोत सारी तस्वीरे लगाई है
पिछले साल ज़िद करके
जाके खिंच्वाई थी शहर के अच्छे से स्टूडीओमे
नदी के किनारो का कोई सीन था पीछे
और “ मैं तुम्हारा किनारा” कहेके
तुमने हाथ पकड़ा था मेरे तस्वीर मे
वो पल वहा क़ैद है
पिछली बार मिले थे तो तुम्ही से
दीवार पर से वो तस्वीर गिर गई थी
काँच टूट कर जैसे तस्वीर मे भी चुभ
गया था … कुछ ख़ून – सा बहा था शायद …
वो टूटी तस्वीर अब भी वही
पड़ी है .. उसी दीवार पर .. वही दूसरी
कुछ ऐसी ही तस्वीरो के साथ
दीवारो मे सिलन हो रही है अब, फिर भी …
ठीक उसके
बाजू वाली दीवार पर
एक खिड़की हुआ करती थी
तुम आते और खड़े रहते
खिड़की के पास
कभी सूरज को वही से
चाय के लिए पूछा था
तुमने, कभी गुलमहॉर के
फूलो का लाल रंग
वही शरमाया था गालो पर
और कभी रात भर वही
खड़े रहे थे मेरी बाहो के सहारे .. चाँद को देखते हुए..
खिड़की तो कमरे की आँखे है
कुछ ऐसा ही कहा था तुमने…
कमरे ने अपनी आँखे मूँद ली है अब…
खिड़की के सामने वाली दीवार पर
एक बिस्तर, एक मेज़ पड़ा है
सफ़ेद रंग की चादर आज भी
बिछी रहती है बिना कोई सिलवट के
और मेज़ पर पड़े रहते है
लाल गुलाब के कुछ फूल
-सूखे से… सुख ही गये है बिल्कुल
मैने फिर कभी फेंका नही
ये सोचकर की तुम आओगे जब,
बदल ही लोगे – हर वक़्त की तरह…
शायद, अब तुम ना आओ तो
ये फूल तो रहेंगे….सूखे ही सही…
और आख़री दीवार की जिसमे
दरवाज़ा था … जहा से तुम आते थे
जाते थे… कभी दरवाज़े पर खड़े खड़े ही
मुजे पुकारते थे… मेरा नाम लेकर
तुम्हे मेरे कमरा पसंद था
और मुजे वो दरवाज़ा
तुम्हारे आने पर जिसे अक्सर बंद कर लेता था मन मेरा…
मैने अपने कमरे का
दरवाज़ा बंद कर दिया है
और ख़ुद को ढूँढने की कोशिश है
पता नही मैं कहा हू
कमरे के भीतर या कमरे के बाहर.
दरवाज़ा बँध कर दिया
वो कमरा … जिसकी चार दीवारे थी
हर दीवार तुमको प्यारी थी
कमरे मे सामने की दीवार पर
बहोत सारी तस्वीरे लगाई है
पिछले साल ज़िद करके
जाके खिंच्वाई थी शहर के अच्छे से स्टूडीओमे
नदी के किनारो का कोई सीन था पीछे
और “ मैं तुम्हारा किनारा” कहेके
तुमने हाथ पकड़ा था मेरे तस्वीर मे
वो पल वहा क़ैद है
पिछली बार मिले थे तो तुम्ही से
दीवार पर से वो तस्वीर गिर गई थी
काँच टूट कर जैसे तस्वीर मे भी चुभ
गया था … कुछ ख़ून – सा बहा था शायद …
वो टूटी तस्वीर अब भी वही
पड़ी है .. उसी दीवार पर .. वही दूसरी
कुछ ऐसी ही तस्वीरो के साथ
दीवारो मे सिलन हो रही है अब, फिर भी …
ठीक उसके
बाजू वाली दीवार पर
एक खिड़की हुआ करती थी
तुम आते और खड़े रहते
खिड़की के पास
कभी सूरज को वही से
चाय के लिए पूछा था
तुमने, कभी गुलमहॉर के
फूलो का लाल रंग
वही शरमाया था गालो पर
और कभी रात भर वही
खड़े रहे थे मेरी बाहो के सहारे .. चाँद को देखते हुए..
खिड़की तो कमरे की आँखे है
कुछ ऐसा ही कहा था तुमने…
कमरे ने अपनी आँखे मूँद ली है अब…
खिड़की के सामने वाली दीवार पर
एक बिस्तर, एक मेज़ पड़ा है
सफ़ेद रंग की चादर आज भी
बिछी रहती है बिना कोई सिलवट के
और मेज़ पर पड़े रहते है
लाल गुलाब के कुछ फूल
-सूखे से… सुख ही गये है बिल्कुल
मैने फिर कभी फेंका नही
ये सोचकर की तुम आओगे जब,
बदल ही लोगे – हर वक़्त की तरह…
शायद, अब तुम ना आओ तो
ये फूल तो रहेंगे….सूखे ही सही…
और आख़री दीवार की जिसमे
दरवाज़ा था … जहा से तुम आते थे
जाते थे… कभी दरवाज़े पर खड़े खड़े ही
मुजे पुकारते थे… मेरा नाम लेकर
तुम्हे मेरे कमरा पसंद था
और मुजे वो दरवाज़ा
तुम्हारे आने पर जिसे अक्सर बंद कर लेता था मन मेरा…
मैने अपने कमरे का
दरवाज़ा बंद कर दिया है
और ख़ुद को ढूँढने की कोशिश है
पता नही मैं कहा हू
कमरे के भीतर या कमरे के बाहर.
~~~ Transformation ~~~
हरे हरे पत्तोसे लिपटी हुई धूप
चमक उठती है,नन्ही सी
गुड़िया की आँखोमे जैसे
चमक उठता है सूरज कोई,
तमन्ना का कोई खिलौना पाकर.
ना धूप रहती है सदा,
ना सूरज की चमक
और फिर
गुड़िया भी तो गुड़िया
कहा रह पाती है हमेशा?
खिलौने बस, बदल जाते है…..
चमक उठती है,नन्ही सी
गुड़िया की आँखोमे जैसे
चमक उठता है सूरज कोई,
तमन्ना का कोई खिलौना पाकर.
ना धूप रहती है सदा,
ना सूरज की चमक
और फिर
गुड़िया भी तो गुड़िया
कहा रह पाती है हमेशा?
खिलौने बस, बदल जाते है…..
~~~ खुदा भी बेईमान होगा ~~~
नीला-पीला धुला - खुला आसमान होगा
खुदा के पास और क्या सामान होगा
बुलाना होगा ख़त भेजकर अब उसको भी
कल से यार भी तेरा मेहमान होगा
साथ लेकर चलना तू एक रोशनी का दिया
अब के सफ़र मे रास्ता भी खुदसे अनजान होगा
दिया जब भी देना था नाप तोल के दिया
पता नही था यू खुदा भी बेईमान होगा
यू ही जाके बैठा है मंदिर मस्जिदो मे
शायद खुदा भी ना जाने कोई इन्सान होगा
आ गया है बच्चो की ज़िलमिलाती हसी मे
उसके दिलमे भी कोई अन्छुआ अरमान होगा
खुदा के पास और क्या सामान होगा
बुलाना होगा ख़त भेजकर अब उसको भी
कल से यार भी तेरा मेहमान होगा
साथ लेकर चलना तू एक रोशनी का दिया
अब के सफ़र मे रास्ता भी खुदसे अनजान होगा
दिया जब भी देना था नाप तोल के दिया
पता नही था यू खुदा भी बेईमान होगा
यू ही जाके बैठा है मंदिर मस्जिदो मे
शायद खुदा भी ना जाने कोई इन्सान होगा
आ गया है बच्चो की ज़िलमिलाती हसी मे
उसके दिलमे भी कोई अन्छुआ अरमान होगा
~~~ छाता ~~~
कल काफ़ी दीनो के बाद
एक भूरा-सा, चंचल
बादल पिघल रहा था…
अपनी मस्ती मे ज़ुमक़र
आने जाने वाले हर शख्श,
हर रास्ते, हर राह,
हर मकान, हर पत्ते
को भिगो रहा था…
मस्ती चढ़ि थी
उसे, बुन्दो की, बौछारो की,
जाने क्या पिलाया था
धूपने उसे….अपनी
सत-रंगी हंसी बिखेर रहा था..
आसमान भी उसको
अपनी पनाहो मे पाकर
कुछ गिला-सा हो रहा था…
अचानक थम गया बादल..
कोई बेचारा – सा
बादल से जाने रूठा - सा
बारिश से छूट रहा था
बादल आया था
मदमस्त होली खेलने
और, वो छुप रहा था …
बादल सा भूरा
उस, बेशरम ने, एक
छाता खोल दिया था
और
बादल को STATUE उसने
जैसे बोल दिया था !!!
एक भूरा-सा, चंचल
बादल पिघल रहा था…
अपनी मस्ती मे ज़ुमक़र
आने जाने वाले हर शख्श,
हर रास्ते, हर राह,
हर मकान, हर पत्ते
को भिगो रहा था…
मस्ती चढ़ि थी
उसे, बुन्दो की, बौछारो की,
जाने क्या पिलाया था
धूपने उसे….अपनी
सत-रंगी हंसी बिखेर रहा था..
आसमान भी उसको
अपनी पनाहो मे पाकर
कुछ गिला-सा हो रहा था…
अचानक थम गया बादल..
कोई बेचारा – सा
बादल से जाने रूठा - सा
बारिश से छूट रहा था
बादल आया था
मदमस्त होली खेलने
और, वो छुप रहा था …
बादल सा भूरा
उस, बेशरम ने, एक
छाता खोल दिया था
और
बादल को STATUE उसने
जैसे बोल दिया था !!!
~~~ धूप ~~~
मुंडेर पर आकर धूप
बैठती है, सुनती है
सूरज की सारी बाते
सूरज की दोस्त हों
जैसे, आ जाती है
धूप…।रोज़……सूरज के साथ साथ
छिप जाती है
घने पेडो के पत्तो के भीतर
तालाब के ठहरे पानी पर
चिलमीलाती है धूप…
छोड़कर जाना चाहो तो
छांव के सर चढ़ जाती है
सूरज की उम्र से बढ़कर
तो उम्र नही होगी उसकी
रोज़ ही आती है……।
रुठ जाती है जब
सूरज से मिलने कभी
बादल आ जाते है
छुप जाती है
नज़र नही आती पर
मेहएसूस कराती है…मैं धुप
फिर ख़ुद ही मान जाती है
कभी बादल के बरसने पर
तोहफ़े मे मिली पानी की
बूँदसे ख़ुश होकर
खिलखिलाती है
इंद्रधनुषी हंसी देते हुए…धूप।
बैठती है, सुनती है
सूरज की सारी बाते
सूरज की दोस्त हों
जैसे, आ जाती है
धूप…।रोज़……सूरज के साथ साथ
छिप जाती है
घने पेडो के पत्तो के भीतर
तालाब के ठहरे पानी पर
चिलमीलाती है धूप…
छोड़कर जाना चाहो तो
छांव के सर चढ़ जाती है
सूरज की उम्र से बढ़कर
तो उम्र नही होगी उसकी
रोज़ ही आती है……।
रुठ जाती है जब
सूरज से मिलने कभी
बादल आ जाते है
छुप जाती है
नज़र नही आती पर
मेहएसूस कराती है…मैं धुप
फिर ख़ुद ही मान जाती है
कभी बादल के बरसने पर
तोहफ़े मे मिली पानी की
बूँदसे ख़ुश होकर
खिलखिलाती है
इंद्रधनुषी हंसी देते हुए…धूप।
~~~ हवाए ~~~
सरहद के उस पार से
आती है सौंधी सी हवाए
शायद वहा पानी बरसा होगा
वहा भी कोई मुज-सा तरसा होगा.
लहेरो ने कांधा दिया होगा
और कुछ फूलोने खुस्बू,
चिड़ियोने दी होगी अपनी आवाज़
और किरनो ने अपनी चलने की धार..
हवाए…
पास आके थम सी गई है
सामने खड़ी है, पुराने
किसी दोस्त की याद लेकर
वही ले आई है साथ मे,
सदके मे भेजी है कुछ बाते भी
शायद….
ज़मीन पर कोई रेखा तो खिंची नही
कही कोई दीवार उसे दिखी नही
मैं देख सकती हू उसे
मेहसूस कर सकती हू उसे
बस छुने भर की देरी है…
पल भर की बात है
फिर वो सन्देसे, वो बाते
मेरे दोस्त की, सिर्फ़ मेरी होगी
वो हवाए मेरी सहेली होगी…
पर आज के अख़बार मे एक ख़बर आई है
आज से उस ओर की हर हवा पर भी टॅक्स लगेगा…
आती है सौंधी सी हवाए
शायद वहा पानी बरसा होगा
वहा भी कोई मुज-सा तरसा होगा.
लहेरो ने कांधा दिया होगा
और कुछ फूलोने खुस्बू,
चिड़ियोने दी होगी अपनी आवाज़
और किरनो ने अपनी चलने की धार..
हवाए…
पास आके थम सी गई है
सामने खड़ी है, पुराने
किसी दोस्त की याद लेकर
वही ले आई है साथ मे,
सदके मे भेजी है कुछ बाते भी
शायद….
ज़मीन पर कोई रेखा तो खिंची नही
कही कोई दीवार उसे दिखी नही
मैं देख सकती हू उसे
मेहसूस कर सकती हू उसे
बस छुने भर की देरी है…
पल भर की बात है
फिर वो सन्देसे, वो बाते
मेरे दोस्त की, सिर्फ़ मेरी होगी
वो हवाए मेरी सहेली होगी…
पर आज के अख़बार मे एक ख़बर आई है
आज से उस ओर की हर हवा पर भी टॅक्स लगेगा…
Subscribe to:
Posts (Atom)